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किसान संगठन ने अब किया श्रम कानूनों वापसी की मांग, मंशा पर उठ रहे सवाल

कृषि क़ानून वापसी के बाद अब किसान संगठन ने श्रम क़ानून वापसी की मान की है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘देश के नाम संबोधन’ में तीनों नए कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया तब सभी लोगों का मनना था के अब किसान आंदोलन ख़त्म हो जाएगा। किसान अपना आंदोलन वापस ले लेंगे। लेकिन पीएम के ऐलान के थोड़ी ही देर बाद ही संयुक्त किसान मोर्चा ने तुरंत बयान जारी कर कह दिया कि किसान दिल्ली की सीमाओं पर तब तक डेरा डाले रहेंगे जब तक कि प्रधानमंत्री की घोषणा के मुताबिक कृषि कानूनों को खत्म करने की संसदीय प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाए।

आंदोलनकारी किसान इतने से भी नहीं माने, उन्होंने सरकार को छह सूत्री मांगों की सूची सौंप दी। उनकी मांगों में एमएसपी पर कानूनी गारंटी, बिजली संशोधन विधेयक की वापसी, पराली जलाने पर किसानों पर दर्ज मामलों की समाप्ति, विभिन्न राज्यों में प्रदर्शन के दौरान किसानों पर दर्ज मामलों की वापसी, गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा की गिरफ्तारी एवं मंत्रिमंडल से बाहर की मांग और आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले करीब 700 किसानों के परिजनों को मुआवजा देना शामिल है। सरकार मुआवजे से लेकर मुकदमों की वापसी तक, इनमें ज्यादातर मांगों पर भी विचार करने को तैयार है। जिसमे से सरकार ने उनके पराली जलाने को लेकर भी उनके मांगों को मान लिया। यहाँ कहा जा सकता है कि रकार ने फिर से नरमी दिखाई और आंदोलनरत किसान की इस जिद के आगे झुकी। और अब सरकार पानी वादो के मुताबिक़ संसद सत्र के पहले ही दिन कृषि कानूनों की वापसी का विधेयक संसद में पेश किया जा रहा है।

लेकिन इसी बीच अब किसान चार श्रम संहिताओं की वापसी की भी मांग भी करने लगे हैं। केंद्र सरकार ने दर्जनों श्रम कानूनों के मकड़जाल को खत्म करके उन्हें चार श्रम संहिताओं में समाहित किया। इसकी मांग वर्षों से हो रही थी। नई व्यवस्था के तहत न्यूतनतम मजदूरी तय करने के साथ-साथ मजूदरों की सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने का प्रस्ताव भी किया गया है। दूसरी तरफ, 300 से कम श्रमिकों वाली कंपनियों को काम के अनुसार नौकरी पर रखने या निकालने की छूट देने का प्रस्ताव भी है।

किसानो के इस कदम से अब अब उनकी मंशा पर भी सवाल उठाने लगे हैं। किसान आंदोलन का मकसद क्या है? यह सवाल फिर से बहुत महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इसकी अगुवाई कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने अपनी मांगों की फेहरशित फिर से बढ़ा दी है। अब किसान आंदोलन के अगुवा देश में मजदूरों का आंदोलन भी खड़ा करने की जुगत में जुट गए हैं। किसान मोर्चा अब मजदूर मोर्चे के साथ गठबंधन करके एक संयुक्त मंच तैयार करने का ऐलान किया है। उसने पांच राज्यों- उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए नई रणनीति पर कदम बढ़ा दिया है।

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